
चलते-चलाते: मंशा
सोचो ! उन माताओं की,
जिसने निज लाल गंवाया है,
मातृभूमि की रक्षा के हित,
पत्थर दिल भी रोया है।
पाँच गाँव प्रस्तावित वार्ता,
शान्ति बनाए रखने खातिर,
मूर्ख घमंडी कौरव के घर,
श्रीकृष्ण दूत बन पहुँचे थे।
युद्ध थोपना था पाण्डव पर,
मूर्ख सुयोधन! अकड़ गया,
गंवा सुहृद परिवार जनों को,
क्षत-विक्षत था स्वयं हुआ।
युद्ध विकल्प सदा अन्तिम है,
गीता यह समझाता है,
धर्म की रक्षा के हित अपना
कर्म सदा बतलाता है।
शान्ति अगर स्वीकार किया,
तो! मंशा है मानव की रक्षा,
नरपिशाच ने यदि न समझा,
विध्वंश! चढ़ेगा फिर प्रत्यंचा।
पक्ष-विपक्ष के सुर तालों से,
बचना अभी जरूरी है ,
समझ-बूझ शतरंजी चालें,
चलना बहुत जरूरी है।
देश के दुश्मन छद्म वेश में,
लुके - छिपे हैं भारत में,
देश तोड़ने की मंशा ले,
अवसर की आकांक्षा में।
इन घर के दुश्मन से पहले,
शासक को अभी निपटना है,
सीमा पार के दुश्मन को तो
मुश्किल नहीं कुचलना है।
युद्ध सदा विध्वंशक है,
जनता को सत्य समझना है।
समझ विपक्षी की चालों को,
उन्मादित हो!नहीं उलझना है।
डॉ सुमंगला झा।
