
बिहार के चोर नेता, चापलूस कार्यकर्ता और अनभिज्ञ मतदाता
चोर नेता, चापलूस कार्यकर्ता
बिहार की सदैव से बड़ी बिडम्बना रही है I अधिकाँश आम बिहारी मासूम हैं और अक्सर घाकुड़ और चालाक नेताओं या उनके चापलूस कार्यकर्ताओं के बहकावे में आ ही जाते हैं I देश को आजादी तो १९४७ में ही मिल गयी थी और प्रजातांत्रिक पद्धति से चुनाव भी वर्ष १९५१-५१ से ही होता आ रहा है लेकिन राजनैतिक दलों द्वारा मासूम जनता को अपने प्रजातांत्रिक मूल्यों से परे रखा गया है जिसमें बिहार सदैव से पिछड़ा रहा है I यहाँ के मतदाताओं को सदैव से गुमराह किया गया है कि वे जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र के आधार पर मतदान करें और यह सिलसिला ऐसा चल पड़ा है कि चलता ही जा रहा है, ख़त्म लेने का नाम ही नहीं ले रहा I इतना ही नहीं, आम जनता को डराया, धमकाया भी जाता रहा है कि अगर किसी दल के बाहुबली चुनावी बूथ पर कब्जा कर ले तो वे आवाज न उठाएँ और जान बचाकर वापस आ जाएँ हालाँकि समय समय पर इसका छिटपुट विरोध भी हुआ है I वैसे विगत दशकों में चुनाव आयोग ने भी चुनावी प्रक्रिया में काफी सुधार भी किया है जिससे राजनैतिक बाहुबलियों में रोष भी है I अब वोटर लिस्ट में डलवाए गए अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों को ही ले लीजिए I आज जब चुनाव आयोग इस वोटर लिस्ट का पुनरावलोकन कर रही है, 'मुस्लिम वोट बैंक' पर पलने वाले राजनैतिक दल विचलित हो शोर मचा रहे हैं I वैसे चोरों के शोर मचाने की प्रथा कोई नई नहीं है I आज कल तो चोरों ने अपना एक अनोखा ठगबंधन बनाकर राजनैतिक चोरों का एक अलग ही अखाड़ा बना लिया है जिस पर हाथ डालने से पुलिस भी झिझकती है (पढ़ें "चोर मचाए शोर", https://thecounterviews.in/articles/chors-yelling-loud/) I इन लोगों ने देश में गद्दारों की एक यूनियन सी बना ली है (पढ़ें "देश के गद्दार", https://thecounterviews.in/articles/chors-scamsters-traitors-of-india/) I
बिहार में चली आ रही चुनावी अनियमितताएँ
लेखक स्वयं बिहारी हैं और अपने बाल्यावस्था के अबोध समय से ही मतदान करते आए हैं क्योंकि किसी ने १०-११ वर्ष की उम्र में ही उनका नाम मतदाता सूचि में डाल दिया था और बताया था कि अंग्रेजों से आजादी दिलाने वाली पार्टी को अपना मत देकर जिताना है I ऐसे मतदाता जो स्वयं उपस्थित नहीं रहते थे उनके बदले किसी और को भेजकर वोट डलवा दिया जाता था I स्वतन्त्रता पश्चात के कुछ दशकों की यही प्रथा थी I १९७० के बाद के दशकों में इस प्रथा में दो आमूल परिवर्तन आए I पहला था जयप्रकाश आंदोलन जिसमें भ्रष्ट व हिटलरशाही कांग्रेस को उखाड़ फेंकनें के लिए जनता पार्टी को वोट देना था और वह काम बखूबी हुआ भी I दूसरा, एक नई चुनावी प्रथा आई जिसमें लल्लू यादव का मुस्लिम-यादव समीकरण बनाना था I इसके तहत राज्य के सारे मुस्लिम और यादव एकजुट हो गए और लल्लू यादव की पार्टी को वोट देने-दिलाने के लिए सारे हथकंडे अपनानें लगे I यह एक सिलसिला सा बन गया जो कुछ अपवादों को छोड़ अब भी कायम है I चारा चोरी के मामले में जब लल्लू जेल गया था तब भी उस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने M-Y चुनावी प्रथा को जारी रखा जिसमें अति पिछड़े वर्ग को भी जोड़ लिया गया I इन सबों का विस्तृत वर्णन अन्यत्र भी किया गया है (पढ़ें "लालू कुनबा और बिहार का दुर्भाग्य", https://thecounterviews.in/articles/lalu-yadav-misfortune-of-bihar/) I यही वह हथकंडा है जिसके बल पर राजद उछल रहा है I
जब से लल्लू यादव के राजद को मुसलमानों को वोट बैंक बनाने में सफलता मिली है तभी से कुछ अन्य राजनैतिक दाल भी इस फ़िराक में लगे रहे हैंकि वे कुछ मुसलमान वोट अपने तरफ मिला सकें I इस प्रकरण में कुछ मुसलमानों को नितीश कुमार अपने JD(U) में मिलाने में सफल रहे I उधर दूसरी तरफ राम विलास पासवान लोक जनशक्ति पार्टी बनाकर जहाँ कुछ दलित वोट, जीतनराम माँझी कुछ महादलित को, तो वहीं ओवैसी बहुतेरे मुसलमानों को अपने साथ लाने में सफल रहे I यह सब लल्लू प्रसाद की M-Y वोट बैंक को कुछ हद तक अवश्य कमजोर किया है I
जो भी वर्ग इस जाति-धर्मगत समीकरण में सेंध लगा लेगा, राजद की महत्वाकांक्षी मनसा को औंधे मुंह गिराने में कामयाब हो जाएगा जैसा कि पिछले चुनाव में असादुद्दीन ओवैसी और जीतनराम माँझी ने किया था I बात सिर्फ मुस्लिम-यादव-दलित वोट बैंक का ही नहीं है I लल्लू के चोरी की चांदी के चंद सिक्कों पर पलने वाले कुछ उच्च वर्ग के चापलूस भी अपने अपने स्वजनों का वोट चोर पार्टी को दिला देते हैं और यही सब रहस्य है बिहार के चोर नेताओं के उछलने का I
नकारात्मक जनमत बनाने की तैयारी
सामूहिक वोट लेने के और भी कई तरीके हैं जिसमें 'मुद्दा' आधारित जनमत भी है जिसे ‘Narrative-making’ भी कहा जाता है I यह जनमत सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी I नितीश सरकार का सकारात्मक पक्ष 'सुशासन' रहा है और लल्लू यादव के राजद का नकारात्मक पक्ष उसकी 'चारा चोरी और जंगलराज', जिसके लिए वह जेल भी जा चुका है I अब जब बिहार में चुनाव होने वाला है, सत्तारूढ़ सरकार के सुशासन को गलत ठहरानें के लिए वहाँ के क़ानून व्यवस्था को हाल के दिनों में 'खून खराबा' कर एक अप्रत्याशित चुनौती दी जा रही है जिससे सबसे ज्यादा चुनावी फायदा वहाँ के विपक्ष को होगा I इसके मार्फ़त बिहार सरकार के सुशासन के खिलाफ नकारात्मक जनमत तैयार करने की कोशिश की जा रही है I यह बिहार की गंदी राजनीति का हिस्सा है (पढ़ें "बिहार की गंदी राजनीति", https://thecounterviews.in/articles/dirty-politics-of-bihar/) I
राजद और कांग्रेस का गठबंधन आज कोई भी हथकंडा अपनानें के लिए तैयार है जिससे वहाँ की सत्ता हासिल की जा सके I उधर नितीश बाबू बूढ़े हो चले हैं और उनसे न तो गृह मंत्रालय द्वारा क़ानून व्यवस्था संभल रहा है और न ही वे मुख्यमंत्री के रूप में बिहार को प्रगति की राह पर ले जानें में सक्षम दिखाई पड़ रहे हैं I दूसरी तरफ बीजेपी में भी करिश्माई नेता का अभाव है जिसे मुख्यमंत्री प्रत्याशी के रूप में प्रस्तुत किया जा सके I वहाँ के विपक्ष को लगता है कि सरकार की छवि पर चोट पहुँचानें का यही सबसे उचित समय है I तो मिलाजुलाकर यह कहा जा सकता है कि विपक्ष नितीश सरकार के सुशासन के खिलाफ एक नकारात्मक सामूहिक जनमत बनाने में सफल होता दीख रहा है I चूँकि बिहार की आम जनता चोर नेता, उसके चापलूस कार्यकर्ता की इस नई चाल के खिलाफ सजग नहीं हैं, यह संभव है कि वे उनके जाल में फँस जाएँ I फिर जैसे कर्नाटक में चोर मानेजानें वाले कांग्रेस सरकार से जनता त्रस्त हो रही है, वही हाल बिहार का भी हो सकता हैं I
निचोड़
बिहार के मतदाताओं से यही अपील है कि वे चोर नेताओं एवं उनके चापलूसों की मनसा को समझें और उनसे सतर्क रहें I कमोवेश साफ़ सुथरी छवि रखने वाली नितीश सरकार के विरुद्ध वहाँ की कानून व्यवस्था के खिलाफ वहाँ के गुंडों द्वारा नकारात्मक जनमत बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है I उधर नितीश बाबू भी बूढ़े हो चले हैं और उनके भी जानें का समय आ गया है I जिस तरह से बिहार में वोट बैंक की राजनीति अपना जड़ फैला रही है, उसे समूल उखाड़ना अनिवार्य है I साफ़ सुथरी छवि रखने वाली पार्टी व नेताओं को भारी मत से जिताएँ और बिहार के विकास का मार्ग प्रशस्त करें I चोर और बाहुबली नेताओं से सावधान I

